45. 1857 की क्रान्ति सागर और नर्मदा क्षेत्र

लेखक - डॉ. पी.एस. मुखारया
संस्करण -2008

मूल्य - 200/-


सागर और नर्मदा क्षेंत्रो में 1857 के संग्राम का उचित मूल्यांकन करने के लिये यहॉ के इतिहास और प्रशासन की एक मोटी रूपरेखा को समझना उपयोगी होगा इसके संबंध में उस भाग का परीक्षण है।

 

सागर और नर्मदा क्षेत्र

 
 

46. बुंदेला विद्रोह
लेखक - डॉ. जयप्रकश मिश्रा
संस्करण-- 2008

मूल्‍य - 200/-


विभिन्न क्षेत्रो में 1857 की क्रांति से पहले जो ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था विकसित हो रही थी और ब्रिटिश शासन के प्रत्यछ रूप से अधीन प्रांतो और क्षेत्रो में जिस प्रशासनिक व्यवस्था की पूर्ण रूप से स्थापना हुई, उसके अध्ययनम में डॉ. जे. पी. मिश्रा ने एक बहूमूल्य अध्याय जोड़ा है

 

बुंदेला विद्रोह

 
 

47- बुंदेलखड का स्वाधीनता आंदोलन और पत्र -पत्रिकाएँ

लेखक - श्री संतोष भदौरिया

संस्‍करण -2008
मूल्य - 150/-


बुंदेलो की भूमि बुंदेखण्ड कई मायने में एतिहासिक और महत्तवपूर्ण है। भारत के मानचित्र में यह क्षेत्र अपनी अलग पहचान रखता है। भारत का हृदय प्रदेश है। इसका अतीत उन्नतशील, समुज्जवल और गौरवशाली है।

 

बुंदेलखण्ड का स्वाधीनता आंदोलन और पत्र-पत्रिकए

 
 
 

48. शहज़ादा फिरोज़ शाह

लेखक -डॉ. सुरेश मिश्र

संस्‍करण - 2008
मूल्य -75/-



1857 के महासंग्राम ने सारे उत्तर भारत को अपनी परिधि में समेट लिया था। घटनाओं के प्रमुख केंद्र उत्तरप्रदेश के कई इलाके रहे और बहादुरशाह जफर, बेगम हज़रत महल, रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे, कुंवरसिंह और बानपुर के मर्दन सिंह जैसे साहसी नेताओं ने इस विद्रोह में प्राण फूंके और उसे एक जनसंघर्ष में बदलने में योगदान दिया। उत्तरप्रदेश के अलावा बुंदेलखण्ड और मालवा भी ब्रिटिश सत्ता को निष्कासित करने के इस प्रयास में पीछे नहीं रहे और यहां भी शाहगढ़ के बखतबली, अमझेरा के बख्तावर सिंह, इंदौर के सआदत खान, रानी अवंतीबाई जैसी विभूतियों ने खुलकर ब्रिटिशों के खिलाफ संघर्ष किया। जब पूरा मालवा ब्रिटिश प्रतिरोध से सुलग रहा था, एकाएक एक ऐसा युवक उल्कापात के समान उभर कर सामने आया कि मालवा के उत्तरी हिस्से को उसने चकाचौंध कर दिया और उसने वहां तक सीमित न रहकर अवध और रुहेलखण्ड तक अन्य सूरमाओं के साथ मिलकर संघर्ष किया और उसका नाम तात्या टोपे के समकक्ष लिया जाने लगा। यह युवक था शाहज़ादा फीरोजशाह, जो दिल्ली के शाही खानदान का सदस्य था।

 

शह्ज़ादा फिरोज़ शाह

 
 

49. मध्य प्रदेश के रणबॉंकुरे

लेखक - डॉ- सुरेश मिश्र
संस्‍करण - 2007
मूल्‍य -100/-


1857 के विद्रोह में पूरे मध्य प्रदेश में सघन घटनाएं घटीं और ब्रिटिश शासन के खिलाफ जमकर संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में स्थानीय राजाओं, जागीरदारों, ताल्लुकेदारों और मालगुज़ारों के साथ-साथ आम जनता ने भी भाग लिया। और कई रणबॉंकुरे ने अपना बलिदान दिया। यदि इन रणबॉंकुरों के बलिदान से भावी पीढ़ी कुछ प्रेरणा ले सके तो पुस्तक लेखन का हमारा प्रयास ज्यादा सार्थक हो सकेगा।

 

मध्य प्रदेश के रणबॉंकुरे

 
 

50. जंग-ए-आज़ादी में भोपाल

लेखक - श्री भगवानदास श्रीवास्तव
संस्‍करण - 2009
मूल्‍य - 200/-


भोपाल रियासत भी 1859 की क्रांति से अछूती नहीं रही। भोपाल रियासत की रीजेंट बेगम के कड़े नियंत्रण की वजह से रियाया की क्रांति के प्रति उमंग जल्दी न उठ सकी। ब्रिटिश शासन भी सीहोर छावनी के सिपहियों की हरकतों से परेशान था। उसी के अनुकरण में भोपाल रियासत की सेना भी बौखला उठी। जब भोपाल नगर अशांत होने लगा तो सीहोर छावनी के सिपाही भी बहक गये। इसी तारतम्य में बैरसिया की रियाया भी कामदार खॉं के नेतृत्व में बौखला उठी, फाज़िल मोहम्मद खॉं तथा आदिल मोहम्मद खॉं को रियाया से व्यपक समर्थन मिलने लगा।

इस संघर्ष में अनेक क्रांतिकारियों को जीवन से हाथ धोना, संपत्ति जाने के अलावा परिवार के सदस्यों को छोड़ भाग जाना पड़ा। इन्होंने राष्टृ की आज़ादी के लिये सब कुछ गवां दिया।  

 

जंग-ए-आज़ादी में भोपाल

 
 

51. जंग-ए-आज़ादी में महाकौशल

लेखक - भगवानदास श्रीवास्तव
संस्‍करण - 2008
मूल्‍य - 80/-


1857 में महाकौशल इलाके पर अंग्रेजी सत्ता कायम थी, केवल छोटी-छोटी देशी रियासतें अवश्य थीं, जिन पर जिलाधिकारी का कमोबेश नियंत्रण था। जिन राजओं और मालगुजारों की सत्ता अंग्रेज सरकार की नीति के फलस्वरूप छिन-भिन्न हो चुकी थी, वे अपनी सत्ता वापिस हासिल करने के लिये प्रयासरत थे और 1857 के आते-आते वे भी जनता के साथ अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ शस्त्र उठाने लग गये।

उत्तरी महाकौशल में जून-जुलाई 1857 से ही विद्रोह की चिंगारियॉं सुलग रही थी। राजा शंकरशाह गौंड और उनके पुत्र रघुनाथशाह की शहादत के बाद तो समस्त महाकौशल क्षेत्र में विद्रोह की आग फैल गई। रामगढ़ की रानी के शौर्य ने तो उत्तरी महाकौशल में आज़ादी की नयी लहर फूंक दी।

अनेक क्रांतिकारियों को जीवन, सम्पत्ति और परिवार से हाथ धोना पड़ा। इन वीरों का बलिदान यदि आज की पीढ़ी को कुछ प्रेरणा दे सकेंगे तो यही इस पुस्तक की सफलता होगी।

 

जंग-ए-आज़ादी में महाकौशल

 

52. जंग-ए-आज़ादी में मालवा-निवाड‌‌

लेखक - भगवानदास श्रीवास्तव
संस्‍करण - 2008
मूल्‍य - 200/-


मालवा, होल्कर तथा सिंधिया के अधिकार क्षेत्रों में था। ये नरेश ब्रिटिश सरकार के परम हितैषी थे, इनके अलावा अनेक छोटे-छोटे राजा भी ब्रिटिश सत्ता से विमुख नहीं हो पा रहे थे। तब भी रियाया मन मसोस कर भुनभुना रही थी। ब्रिटिश सरकार ने इस समय की परिस्थितियों को भॉंप कर मिलिटरी छावनियॉं में नीमच, मल्हारगढ़, आगर और महीदपुर में छावनियॉं थी। सिंधिया का मालवा (उज्जैन) में उसका सरसूबा बाबा आपटे तथा रामपुरा का अमील शिवचंद कोठारी ब्रिटिश सरकार के इशारे पर प्रशासन चलाते थे। रियाया पर दमन होता रहे- इसे देखकर रियाया में भी सरकार के खिलाफ विद्रोही भावना घर करने लगी। अनेक क्रांतिकारियों ने अपने जीवन की आहूति देकर इस आंदोलन को और भी बढ़ावा दिया।

उत्तरी मालवा में दिल्ली सम्राट बहादुर शाह जफर के भांजे ने क्रांति की बागडोर संभाली तो आदिवासी बाहुल्य में काजा नायक और भीमा नायक ने ब्रिटिश सरकार के नाक में दम कर दिया। हमें मालवा के वीरों पर हमेशा गर्व रहेगा।

 

जंग-ए-आज़ादी में मालवा-निवाड़

 

 

 

53. खण्डोबल्लाल

लेखक - श्रीधर पराडकर
संस्‍करण - 2012
मूल्‍य - 80/-



खण्डोबल्लाल हमारे आदर्श कुछ पूर्ण धारणाओं के कारण सिंहासनाधिष्ठित होने के पश्चात् सम्भाजी ने खण्डोबल्लाल के पिता को मृत्यु के घाट उतार दिया । बाद में जब सम्भाजी ने ओरंगजेब को बंदी बना लिया तो खण्डोबल्लाल ने अपने प्राण संकट में डाल कर बचाने का प्रयत्न किया ।

 

खण्डोबल्लाल

 

 

 

 

54. आदि विक्रमादित्य

लेखक - डॉ. भगवतीलाल राजपुरूहित
संस्‍करण - 2008
मूल्‍य - 100/-



भारतीय साहित्य और लोकत्रुटि के महानायक विक्रमादित्य की राज्य और न्याय व्यवस्था का स्मरण आज भी सुधिजन करते हैं। सम्वत प्रवर्तक युगांतरकारी विक्रमादित्य के बारे में शिलालेख, मुद्राएं, साहित्य और अनुश्रुतियों में अनेकाएक विवरण और प्रमाण उपलब्ध हैं। ऐसे प्रेरणास्पद विक्रमादित्य के बारे में डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित की शोध पुस्तिका आदि विक्रमादित्य एक लोकोपयोगी प्रयास है। स्वराज संस्थान की अक्षनिधि पुस्तक मालांतर्गत यह पहल जिज्ञासुओं के लिये प्रेरणा देने का कार्य करेगी।

 
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आदि विक्रमादित्य

 
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55. 1857 - बलवा नहीं मुक्ति संग्राम

लेखक - निर्मल शर्मा
संस्‍करण - 2008
मूल्‍य - 50/-



क्या था 1857 ? क्यों और कैंसे घटित हुआ 1857 ?सीधा-सादा और साधारण-सा,सपाट उत्तर तो यही होगा कि चर्बी युक्त कारतूस ने हिंदू-मुस्लिम सिपाहियों की भावनाओं को भड़का दिया था इसलिये हुआ था 1857 जो महज़ बलवा या गदर था। केवल सिपाही विद्रोह।

 

 

1857 - बलवा नहीं मुक्ति संग्राम

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56. आदि विद्रोही

लेखक - श्रीराम तिवारी
संस्‍करण - 2012
मूल्‍य - 500/-



भारत के स्वाधीनता संग्राम में जनजातीय प्रतिरोध की एक अहम और दीर्घ-प्रभावकारी भूमिका रही है। अंगरेजी हुकूमत और उसके देशी जमींदार, भूपति, श्रीमंतों आदि के वफादार गठजोड द्वारा जंगल, वनस्थलों की भू-संपदा और जनजातीय समाजों का हक-हिस्सा दबाते चले जाने से उपजे प्रतिरोध और बाद में विकसित होते चले गये संगठित-असंगठित विद्रोहों की श्रंखला के असर बहुआयामी रहे हैं। इन्हें एक अर्थ में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की पूर्व पीठिका भी माना जा सकता है। सामाजिक-आर्थिक दमन और अपनी ज्ञान तथा सांस्कृतिक पद्धतियों के अपमान के विरूद्ध "आदि-विद्रोहों" का सिलसिला अंगरेजों के देश में काबिज होते चले जाने के साथ-साथ आरंभ हो चुका था। 1763 में हुए सन्यासी-फकीर विद्रोह से लगभग आरंभ हुए इस सिलसिले में धलभूम, रोशनाबाद, संदीप, मेआमरिया, हलबा, पहाडिया, चेरो, गंजाम, भील, हो, कोल, अबोर, खोंड, बिरसा, भुमकाल, गारो, कोई, जयंतिया, कूकी, मुरिया, गोंड, रमोशी, नागा, लुशाई आदि कोई 61 से भी अधिक छोटे-बड़े प्रतिरोध -विद्रोह गिने जा सकते हैं।

प्रस्तुत पुस्तकाकार आदि विद्रोही में राष्ट्रीय आंदोलन का मूल्यवान हिस्सा रहे जनजातीय प्रतिरोधों-विद्रोहों, उसके नेतृत्व, उसे आंदोलित करने वाले विचारों व शक्तियों से रूबरू कराने की एक कोशिश है, साथ ही इसमें मूल्यवान जनजातियों संघर्षों को लक्ष्य कर जनजातीय कलाकारों द्वारा किये गये चित्रांकन को भी शामिल किया गया है। यह दर्ज़ करना जरूरी ही था कि आदिवासी-जन अपने इतिहास को किस तरह देखते हैं। आदि-विद्रोह गाथा को शब्दों, रेखाओं तथा रंगों के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयास उपयोगी साबित होगा।  

 

 

आदि विद्रोही

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57. राजा भोज

लेखक - डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित
संस्‍करण - 2011
मूल्‍य - 80/-



भारतीय साहित्य, ज्ञान साधना और सुशासन के सर्जक राजा भोज अपने कृतित्व, व्यक्तित्व, व्यवहार तथा उदारता के कारण पूरे भारत वर्ष में ही समादृत नहीं रहे हैं बल्कि देश की सीमाओं के बाहर भी इनकी यशस्वी ख्याति रही है। लगभग 84 से अधिक ग्रंथों के रचयिता राजा भोज के ग्रंथों से साहित्य, साहित्य शास्त्र, व्याकरण कोष, संगीत, इतिहास दर्शन, ज्योतिष, धर्मशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, आयुर्वेद, स्थापत्य, नगर योजना, प्राकृत काव्य, अश्वशास्त्र, रत्न, पशु विज्ञान, जलयान विषयक जानकारी मिलती है। राजा भोज एक महान निर्माता एवम नगर परिकल्पक भी थे। धार नगरी में आश्चर्यजनक यंत्रों के निर्माण का श्रेय भी उन्हें जाता है। मंदिर श्रंखला और जल क्षेत्र श्रंखला और जल क्षेत्र श्रंखला निर्माण भी उन्हीं की देन है। बहुरंगी व्यक्तित्व वाले राजा भोज, भारतीय संस्कृति और परम्परा के अनन्य उपासक व साधक रहे। उनकी रचनाएं तथा साहित्य आज भी बौद्धिकों के लिये मार्गदर्शक हैं।

लोक आस्था के सर्जक राजा भोज के राज्यारोहण सहस्त्राब्दी वर्ष समारोह पर हमने राजा भोज के मूल्यों को जीने, इतिहास से प्रेरणा पाने और भारतीय परम्परा से जुड़ने का संकल्प लिया है। पुस्तक राजा भोज वास्तु कला, जल संरक्षण, रसायन नीति, सुनियोजित राज व्यवस्था एवं व्यापक दूरदृष्टि से समाज को जागृत करने में सफल होगी।

 

 

राजा भोज

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58. पुराणों में विक्रमादित्य

लेखक - डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित
संस्‍करण - 2012
मूल्‍य - 85/-



पुराण हमारी संस्कृति के आदर्श एवं प्राचीन भारत के दर्पण हैं। उनमें प्राचीन विभिन्न वंशावलियां और राजाओं के विवरण भी प्राप्त होते हैं। महाराजा विक्रमादित्य भारत के आदर्श शासक रहे हैं। उनसे संबंधित विवरण भी पुराणों में प्राप्त होते हैं। इन सबका संकलन इस पुराणों में विक्रमादित्य पुस्तक हिंदी अनुवाद सहित प्रकाशित किया जा रहा है। सुधी पाठकों और शोधार्थियों के लिये यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी।

 

 

पुराणों में विक्रमादित्य

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59. जनजातीय लोकगीतों में स्वातंत्र्य चेतना

लेखक - डॉ. विजय चौरसिया
संस्‍करण - 2009
मूल्‍य - 300/-



जब तक कोई गीत लोक प्रचलन में नहीं आता, तब तक उसे लोकगीत की मान्यता प्राप्त नहीं होती, दूसरे शब्दों में लोक द्वारा मान्य न किये गये गीत को लोकगीत का दर्ज़ा नहीं मिलता। बघेलखंड, बुंदेलखंड, छत्तीसगढ़, निमाड़, मालवा आदि अंचलों में गाये जाने वाले लोकगीतों में समय के अनुसार गीतों के विषय भी बदलते रहते हैं। राजनैतिक चेतना में इस परिवर्तन का प्रभाव बहुत अधिक रहा है, क्योंकि देश के बदलते राजनैतिक परिदृश्य के साथ-साथ लोकगीतों के राजनैतिक विषय भी बदले हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व इन लोकगीतों में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस, स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रयास, अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किये गये अत्याचार तथा अंग्रेजों को डराने-धमकाने जैसे विषय विशेष रूप से रहे हैं। कुछ लोकगीत ऐसे भी हैं, जो सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से प्रेरित होकर लिखे और गाये गये हैं। जिनमें झॉंसी की रानी लक्ष्मी बाई, रानी दुर्गावती तथा उनके समकालीन एवं सहयोगी नायक-नायिकाओं पर केंद्रित गीत हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात ऐसे लोकगीत के विषय सामाजिक कुरीतियॉं जैसे - नशा, जनसंख्या वृद्धि नारी उत्पीड़न, दहेज, बाल-विवाह आदि रहे हैं। अतः ऐसे विषय लंबे समय तक या फिर आज तक लोकगीतों के सामाजिक चेतना के आधार रहे हैं।

यह संपूर्ण कार्य प्रदेश के जनपदीय और जनजातीय क्षेत्रों में स्वयं भ्रमण कर वृद्ध लोक गायकों, उनकी पांडुलिपियों एवं संदर्भ ग्रंथों से प्राप्त लोकगीतों का संकलन किया गया है।

 

 

जनजातीय लोकगीतों में स्वातंत्र्य चेतना

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60. राजा भोज और परमारकालीन नगर स्थापत्य

लेखक - निर्मला राजपुरोहित
संस्‍करण - 2011
मूल्‍य - 120/-



मालवा भारत की हृदयस्थली है और परमार युग मालवा की सर्वांगीण उन्नति का अपरिहार्य-स्तम्भ है। प्रायः चार शताब्दियों तक मालवा पर परमार राजवंश का एकछत्र शासन रहा। इस युग में इस क्षेत्र में वास्तुकला, मूर्तिकला तथा ज्ञान की विविध धाराओं की समृद्धि में प्रचुर प्रवृत्ति हुई। एक से बढ़कर एक रचना प्रकट होती है और उस सर्वांगीण उन्नति की मूल परियोजना राजा भोज की रही।

परमार शासक स्वयं कलाविद, विद्वान और विद्वत्ता का आदर करने वालों में अग्रणी थे। राजा मुंज और भोज उनमें सर्वप्रसिद्ध हैं। परंतु उदयादित्य, नरवर्मा, अर्जुनवर्मा, आदि का भी इसमें इस दिशा में योगदान न्यून नहीं है। इन्होनें मालवा को भवनों और मंदिरों से समृद्ध कर दिया। राजा भोज ने वास्तु सम्बम्धी समरांगणसूत्रधार, युक्तीकल्पतरू आदि आकर ग्रंथ भी रचे। उनमें नगर निर्माण आदि से सम्बम्धी प्रचुर सामग्री सन्निहित है। आज परमारयुगीन बस्तियों के अवशेष मालवा में युगीन परिवर्तन के साथ सुलभ हैं। इन बस्तियों और ग्रंथगत विशेषतओं में कितना तालमेल है- यह देखना-परखना भी तुलनात्मक दृष्टि से आवश्यक है। उसी दृष्टि से यह "राजा भोज और परमारकालीन नगर स्थापत्य" पुस्तक लिखी गयी है। ऐसे प्रयास अन्य युग के अध्ययन के लिये भी सार्थक होंगे।

 

 

 

राजा भोज और परमारकालीन नगर स्थापत्य

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61. जंगल सत्याग्रह

लेखक - घनश्याम सक्सेना
संस्‍करण - 2009
मूल्‍य - 300/-



जंगल सत्याग्रह भारतीय स्वाधीनता संग्राम का अपेक्षाकृत एक अल्पज्ञात मगर एक महत्त्वपूर्ण आंदोलन है। नमक सत्याग्रह के समानांतर यह सत्याग्रह मध्य प्रदेश के काफी बड़े भू-भाग में हुआ था और इसके माध्यम से मध्यप्रदेश के स्वतंत्रता सेनानियों ने विशेषकर आदिवासीजन ने स्वाधीनता आंदोलन की तपिश को और अधिक तीव्र किया था। राष्ट्रीय स्तर पर महात्मा गांधी ने स्वदेशी संसाधनों के अंग्रेजों द्वारा दोहन के विरूद्ध नमक सत्याग्रह का प्रवर्तन किया था और उसी समय मध्यप्रदेश में जंगल सत्याग्रह के माध्यम से वन संपदा के दोहन के विरोध मे अलख जगाया था। जंगल सत्याग्रह के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर देश भर में वन संपदा की रक्षा के लिये वनाधिकार कानून का प्रवर्तन हुआ है।

चित्रांकित पुस्तक जंगल सत्याग्रह के माध्यम से आंदोलन के अनेक अज्ञात तथ्य उजागर हुए हैं। यह पुस्तक स्वातंत्र्य समर के गौरव को जागृत करने में सफल होगी।

 

जंगल सत्याग्रह

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62. आत्मालोचन

लेखक - डॉ‌. भगवानदास माहौर
संस्‍करण - 2011
मूल्‍य - 50/-


डॉ. भगवानदास माहौर स्वतंत्रता संग्राम के तपे-तपाए सैनिक हैं। लगभग 15 वर्ष वे ब्रिटिश गवर्नमेंट की जेलों में रह चुके हैं और यदि अमरशहीद सरदार भगतसिंह के केस के मुखबिरों पर गोली चलाते समय उनका निशाना ठीक बैठता तो वे भी फ़ॉंसी पर लटका दिये जाते और उनकी गणना अमर शहीदों में की जाती। अमर शहीद चंद्र शेखर आज़ाद के साथियों में वे सबसे कुशल निशानेबाज़ माने जाते थे।

कठमुल्लेपन से वे कोसों दूर हैं और तटस्थ वृत्ति से किसी विषय की समीक्षा करने की क्षमता वे रखते हैं। माहौरजी ने अपने असाधारण व्यक्तित्व का निर्माण स्वयं किया है। लेखक के रूप में उनकी बड़ी खूबी यह है कि वे साहित्यिक और सांस्कृतिक प्रश्नों पर बड़े संतुलित विचार रखते है और उन्हें संयत भाषा में प्रकट करने की शक्ति भी उनमें है।

 

 

आत्मालोचन

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63. भारत के विकास की भावी दिशा

लेखक - प्रो. कुसुमलता केडिया
संस्‍करण - 2014
मूल्‍य - 300/-


विकास को इन दिनों अर्थशास्त्र का लक्ष्य माना जाता है। जिसे आजकल हिंदी में अर्थशास्त्र कहा जा रहा है, वह अंग्रेजी के 'इकॉनॉमिक्स' का अनुवाद है। प्राचीन भारत में जिसे अर्थशास्त्र कहते थे, उसका अर्थ भिन्न था। चाणक्य ने कहा है- 'मनुष्यों की जो वृत्ति है, वह अर्थ है।' वृत्ति क्या है ? जो जिससे जीवित रहे, वही उसकी वृत्ति है। अतः वृत्ति का मुख्य अर्थ हुआ जीविका एवं प्रधान प्रवृत्ति। चाणक्य कहते हैं- मनुष्यों से भरी-पूरी जो भूमि है, क्षेत्र है, जनपद है, राज्य है, वह भी 'अर्थ' कहा गया है। इसे प्राप्त करने का शास्त्र ही अर्थशास्त्र है। यह शास्त्र इस लोक और परलोक की प्राप्ति और रक्षा में सहायक है तथा धर्म अर्थ एवं काम-इन तीन पुरूषार्थों में प्रवृत्त और इनकी रक्षा करता है तथा अधर्म का नाश करता है।

 

 

भारत के विकास की भावी दिशा

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64. लक्ष्मीबाई रायसौ

लेखक - डॉ. रामस्वरूप ढेंगुला
संस्‍करण - 2012
मूल्‍य - 200/-


भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की परंपराएं पाई जाती हैं। उन्हीं में से एक वाचिक परंपरा का अपना इतिहास और संस्कृति है। बुंदेलखण्ड के जनमानस ने इस वाचिक परंपरा को अपने स्मृति में सहेज कर रखा है। आल्हा-ऊदल और कुंवर हरदौल के किस्से जनकवियों और भाटों द्वारा गली-गली गाए जाते थे। इन महारथियों को हर जुबां और दिल तक पहुंचाने का कार्य वाचक परंपरा ने ही किया।

भारत की प्रचीन काव्य परंपरा में रायसौ या रासो शैली का अपना महत्तवपूर्ण स्थान है। रायसौ या रासो प्रबंध काव्य के रूप में मिलते हैं, जिनमें वीरता के साथ-साथ श्रृंगार का वर्णन भी होता है। रासो में नायक या मूल चरित की यशोगाथा का सुंदर वर्णन मिलता है।

इस पुस्तक के माध्यम से 1857 की वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के शौर्य के किस्से जन-जन तक पहुंचेंगे।

 

 

लक्ष्मीबाई रायसौ

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65. समंदर प्राण अकुलाया !

लेखक - रवींद्र भट
संस्‍करण - 2013
मूल्‍य - 200/-


स्वतंत्रता संग्राम के दौर में वीर सावरकर की वीरता या यूं कहें अंग्रेजी शासन के खिलाफ उनकी उद्दंडता का डंका बजा। वीर सावरकर ने देश को उस सुसुप्तावस्था से जगाया जो सहनशीलता का लिहाफ पहन चैन की नींद सोकर देश को सिर्फ नारों के जरिये स्वतंत्र कराने का प्रयास कर रही थी। उन्होनें सिखाया कि स्वतंत्रता मिलती नहीं है छीननी पड़ेगी और उसके लिये किया गया प्रयत्न कभी-कभी रौद्र अवश्य हो सकता है किंतु कभी भी नाजायज़ या गलत नहीं।

स्वांतत्र्यवीर सावरकर के विचारों से युवा पीढ़ी कुछ प्रेरणा ग्रहण कर सके, उनकी शौर्य गाथा से परिचित हो सके, यही इसकी सार्थकता होगी।

 

 

 

समंदर प्राण अकुलाया !

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66. वेताल पंचविंशतिका

लेखक - डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित
संस्‍करण - 2012
मूल्‍य - 300/-


विक्रमादित्य भारतीय अस्मिता का आदर्श है। उसकी कथाएं गुणढय की बृहत्कथा के परवर्ती संस्कृत रूपांतरों में प्राप्त होती है। उन कथाओं में वेतालपंचविंशति सर्वाधिक लोकप्रिय है। उन कथाओं में सामाजिक, नैतिक या ज्ञान-विज्ञान की विभिन्न समस्याओं का समाधान दिया गया है। प्रश्नोत्तर की परंपरा भारतीय परंपरा में पुरातन काल से हो रही है। प्रश्नोपनिषद प्रसिद्ध है ही। भगवदगीता या पुराणों में भी जिज्ञासा की शांति के कथात्मक प्रयास है।

वेतालपंचविंशतिका के विभिन्न रूप विभिन्न भाषाओं में प्रायः एक सहस्त्राब्दी से प्रचलित हैं। प्रथम शताब्दी की वड्ढ्कहा के तीन संस्कृत रूपांतर ही अब सुलभ हैं जो नौवीं से ग्यारहवीं शताब्दी के हैं। उनमें से नौवीं शती का रूपांतर अत्यंत संक्षिप्त होने से उसमें वेतालपंचविंशतिका नहीं है। परंतु शेष दोनों में है। वे मूल कथाएं भविष्य पुराण में भी प्राप्त होती हैं। अतः सभी मूल कथाएं एकत्र एक ही पुस्तक में आ जाने से स्त्रोत सामग्री के रूप में अध्येताओं के लिये उनकी महत्ता बढ़ जाती है जिससे मूल कथाओं और परवर्ती कथाओं का तुलनात्मक अध्ययन हो सके। पाठकों की सुविधा के लिये मूल संस्कृत के साथ ही उसका हिंदी अनुवाद भी दिया गया है। परिशिष्ट में बृहत्कथामंजरी और कथासरिसागर के लम्बकों का तुलनात्मक क्रम भी दे दिया गया है।

 

 

वेताल पंचविंशतिका

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67. भोजराज कृत चाणक्य-माणिक्य (चाणक्य-राजनीति-शास्त्र)

लेखक - डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित
संस्‍करण - 2012
मूल्‍य - 120/-


एक सफल विजेता, शासक और आकर्षक व्यक्तित्व के लिये राजा भोज सदैव स्मरणीय हैं। उन्होनें विविध विषयक ग्रंथों की रचना की। उनके ग्रंथों में कुछ शास्त्रीय तथा कुछ लोकोपयोगी हैं। राजा भोज का "चाणक्य-माणिक्य" ग्रंथ प्राचीन राजनीतिशास्त्र से संबंधित तो है ही, साथ ही इसमें लोकनीति का भी समावेश होने से यह सर्वकालीन समाज के लिये भी मार्गादर्शक होगा।

राजा भोज सहस्त्राब्दी समारोह अवसर पर राजा भोज की राजनीति संबंधी चाणक्य-माणिक्य पुस्तक मूल संस्कृत पाठ के हिंदी अनुवाद सहित सुधिजनों के लिये है। चाणक्य-माणिक्य पुस्तक राजनीति संबंधी विषयों पर व्यापक दूरदृष्टि से समाज को जागृत करने में सफल होगी।

 

 

चाणक्य-माणिक्य

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68. कश्मीर का ज़िहादी आतंक

लेखक - क्षमा कौल
संस्‍करण - 2012
मूल्‍य - 60/-


आधुनिक भारतीय इतिहास को तथ्यों और भारतीय दृष्टि एवं प्रमाणों पर आधारित सत्य रूप में प्रस्तुत करने वाले श्रेष्ठ भारतीय इतिहासकारों में श्री धर्मपाल अग्रणी रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की समस्या अत्यंत गम्भीर है। उस पर सम्पूर्ण देश चिंतित है। सुश्री क्षमा कौल ने कश्मीरी पंडिता के रूप में उस आतंकवाद के आतंक को स्वयं भी अपने परिवार के साथ झेला है और सम्पूर्ण कश्मीरी पंडितों की व्यथा और यंत्रणा की वे साक्षी रही हैं। एक देशभक्त लेखिका के रूप में इस यातना ने उनकी देशभक्ति को और संकल्पशक्ति को गहराई और दृढ़ता दी है, जो कि उनके व्यक्तित्व की दृढ़ता की सूचक है। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की समस्या पर और उससे सम्पूर्ण भारत में पड़ रहे प्रभाव पर धर्मपाल शोधपीठ के आयोजन में उन्होनें जो व्याख्यान दिया, वह पुस्तककार प्रस्तुत है। इस आतंकवाद का संबंध सम्पूर्ण देश से है। अतः देशवासी उस पूरे संदर्भ सहित जानें, यह आवश्यक है।

 

 

कश्मीर का ज़िहादी आतंक

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69. बलिदान

लेखक - डॉ. भगवानदास माहौर
संस्‍करण - 2011
मूल्‍य - 50/-


मध्यप्रदेश के लिये डॉ. भगवानदास माहौर महान विभूति हैं। वे अपनी जवानी के दिनों में ही क्रांतिकारियों की टोली में शामिल होकर भारतीय स्वतंत्रता के लिये प्रतिबद्ध रहे। देशभक्ति की अद्भुत मिसाल चंद्रशेखर आज़ाद, शहीद शिरोमणि भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू जैसे क्रांतिकारियों से अंतरंग रूप से जुड़े हुए थे। उनके जीवन के तकरीबन तीन दशक भारत की स्वतंत्रता के लिये संघर्ष में बीते। आज़ादी मिलने के बाद माहौरजी के लेखन में भी राष्ट्रीय भावना निहित रही। उनका सम्पूर्ण साहित्य देश की अमूल्य निधि है।

प्रस्तुत पुस्तक बलिदान में संग्रहित एकांकी 'बलिदान', 'एका' और 'जन्म दिवस' स्वातंत्र्य चेतना और राष्टृ प्रेम की अद्भुत मिसाल है।

 

 

 

बलिदान

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70. काकोरी - शहीद स्मृति

लेखक - डॉ. भगवानदास माहौर
संस्‍करण - 2012
मूल्‍य - 150/-


भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास कुछ ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करता है, जिनसे सीख भी मिलती है और प्रेरणा भी। स्वतंत्रता संग्राम की काकोरी घटना स्वाधीनता के लिये कुछ भी कर गुजरने की घटना थी। काकोरी के शहीदों की शहादत युवाओं में समर्पण का भाव, एकजुटता और अपने राष्टृ की आज़ादी के लिये उत्सर्ग से पीछे नहीं हटने की प्रेरणा देती है, भारत के स्वतंत्रता संग्राम की यह अनोखी बात थी।

काकोरी अर्द्धशताब्दी समारोह अवसर पर जाने माने क्रांतिकारी डॉ. भगवानदास माहौर के संपादन में काकोरी शहीद स्मृति पुस्तक पहली बार प्रकाशित हुई। इस दुर्लभ पुस्तक में प्रकाशित आलेख अपने तथ्यों को स्वयं क्रांतिवीरों ने लिखा है। अतः इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है।


 

काकोरी - शहीद स्मृति

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71. प्राचीन मालवी गाथाएं

लेखक - डॉ. पूरन सहगल
संस्‍करण - 2013
मूल्‍य - 130/-


परंपराओं का सबसे सबल संरक्षक लोक है और लोक का सबसे बड़ा आधार होता है वाचिक परंपरा। इसी परंपरा में बहकर संस्कृति और संस्कार को संयोयी गाथाएं युगों-युगों तक पीढ़ियों को सिंचित करती है। आधुनिकीकरण के कारण ये परंपराएं कुछ शिथिल सी पड़ गई हैं। उस धरोहर को मूल स्त्रोतों से अर्जित करना काफी दुष्कर कार्य है। इस पुस्तक में ऐसी ही धरोहर को संकलित कर दुर्लभ मालवी प्राचीन लोकगाथाओं का संकलन किया है। इस पुस्तक के माध्यम से महान विभूतियों-विक्रमादित्य, भर्तृहरि, भोज, कालिदास की गाथाओं के बारे में और अधिक जानकारी मिलेगी।

काकोरी अर्द्धशताब्दी समारोह अवसर पर जाने माने क्रांतिकारी डॉ. भगवानदास माहौर के संपादन में काकोरी शहीद स्मृति पुस्तक पहली बार प्रकाशित हुई। इस दुर्लभ पुस्तक में प्रकाशित आलेख अपने तथ्यों को स्वयं क्रांतिवीरों ने लिखा है। अतः इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है।

 

 

प्राचीन मालवी गाथाएं

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72. देशभक्ति: विविध आयाम

संपादक - रामेश्वर मिश्र पंकज
संस्‍करण - 2014
मूल्‍य - 120/-


आधुनिक भारतीय इतिहास को तथ्यों एवं प्रमाणों पर आधारित सत्य रूप में प्रस्तुत करने वाले श्रेष्ठ भारतीय इतिहासकारों में श्री धर्मपाल अग्रणी रहे हैं। मध्यप्रदेश में धर्मपाल समग्र के गुजराती और हिंदी अनुवादों के लोकार्पण समारोह में धर्मपाल शोधपीठ की स्थापना की घोषणा की। तदनुसार मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग के अंतर्गत धर्मपाल शोधपीठ की स्थापना हुई है। प्रदेश एवं देश के शीर्षस्थ इतिहासकारों, दार्शनिकों, न्यायविदों, विधिवेत्ताओं, समाजवैज्ञानिकों, राजनीतिशास्त्रियों, अर्थशास्त्रियों एवं लेखकों ने इसकी राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक संगोष्ठियों में सहभागी होकर भारतीय इतिहास के विविध पक्षों पर गम्भीर शोधपत्र एवं शोधपूर्ण व्याख्यान प्रस्तुत किये हैं।

धर्मपाल शोधपीठ विद्वानों के इन अनुसंधानों, शोध-निष्कर्षों एवं इतिहास के विश्लेषणों को व्यापक समाज तक पहुंचाने के लिये प्रयासरत है। ये प्रकाशन इसी दिशा में प्रयास हैं, जिससे कि अपने इतिहास का तथ्य सामने आए और सभी को देशभक्ति से भरपूर पुरूषार्थ की प्रेरणा मिले।

 

 

देशभक्ति: विविध आयाम

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73. भारत का संविधान और भारत का धर्म

लेखक- प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज
संस्‍करण - 2013
मूल्‍य - 150/-


आधुनिक भारतीय इतिहास को तथ्यों एवं प्रमाणों पर आधारित सत्य रूप में प्रस्तुत करने वाले श्रेष्ठ भारतीय इतिहासकारों में श्री धर्मपाल अग्रणी रहे हैं।

धर्मपाल शोधपीठ विद्वानों के इन अनुसंधानों, शोध-निष्कर्षों एवं इतिहास के विश्लेषणों को व्यापक समाज तक पहुंचाने के लिये प्रयासरत है। ये प्रकाशन इसी दिशा में प्रयास हैं, जिससे कि अपने इतिहास का तथ्य सामने आए और सभी को देशभक्ति से भरपूर पुरूषार्थ की प्रेरणा मिले। धर्मपाल शोधपीठ के इन प्रकाशनों की पहुंच प्रदेश एवं देश के सभी महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, अकादमियों एवं शिक्षा केंद्रों तक हो तथा इन पर व्यापक राष्ट्रीय चिंतन एवं मंथन चले। अपने इतिहास का सत्य देशभर में सबके ज्ञान में उज्जवल रूप में आए और सभी को प्रेरणा, प्रकाश और राष्ट्रगौरव की अनुभूति हो सके।

 

 

भारत का संविधान और भारत का धर्म

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74. स्वातंत्र्य समर में हरदा 1857-1947

लेखक- डॉ. धर्मेंद्र पारे
संस्‍करण - 2012
मूल्‍य - 200/-


भारत में अंग्रेज और उनकी अंग्रेजीयत के विरूद्ध सामूहिक संघर्ष का नाम है 1857 । यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का एक ऐसा उद्घोष है जिसकी अनुगूंज संपूर्ण भारत में प्रतिध्वनित है। इससे पहले और न इसके बाद आज तक के इतिहास में भारतीयत्व के प्रति ऐसी एकजुटता कहीं दिखाई नहीं देती। 1857 के संग्राम में धर्म की, जाति की, वर्ग की, वर्ण की और सामाजिक ऊंच-नीच की सभी सीमाएं टूट गई थीं। युद्धकाल में न मुसलमानों को मंदिर के भंडारे से परहेज था न हिंदुओं को मस्जिद के पानी से। 1857 के इतिहास में हर पन्ने पर राजा और रंक एक साथ युद्ध करते दिखाई देते हैं। सबके मन में एक ही ओज, एक ही उमंग और एक ही ललक थी-भारत की आज़ादी।

1857 के इस महासमर में मध्यप्रदेश की भूमिका किसी अन्य प्रांत की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण और गंभीर थी। ग्वालियर और सागर संभाग इन रणनीतियों के प्रमुख केंद्र थे। यही नहीं 1857 की क्रांति के भूमिगत योद्धाओं ने मध्यप्रदेश में ही रहकर युद्ध का संचालन किया।

किसी भी राष्ट्र के भविष्य की बुनियाद उसके वर्तमान से ही उद्भूत होती है और वर्तमान का आधार इतिहास की स्मृतियों से मजबूत होता है। यदि हमें भविष्य में एक समरस समाज का संकल्प लेना है एकजुट, एक प्राण राष्ट्र की कल्पना करनी है तो आने वाली पीढ़ी को 1857 मुक्ति संग्राम के इतिहास की संपूर्ण जानकारी देना ही होगी।

 

 

स्वातंत्र्य समर में हरदा 1857-1947

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75. अंग्रेजी राज में किसान विद्रोह

लेखक- डॉ. प्रभा श्रीनिवासुलु
संस्‍करण - 2008
मूल्‍य - 200/-


1857 मुक्ति संग्राम अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति का हमारा समवेत संघर्ष तो था ही, साथ ही साथ यह संग्राम भारत के समाज, संगीत, शिक्षा, विज्ञान, उद्योग, कृषि, व्यापार आदि सभी क्षेत्रों में जागरण का भी एक महत्वपूर्ण कदम रहा है।

यह हमारे लिए गौरव की बात है कि इस मुक्ति संग्राम में राजा, सिपाही, मजदूर, कृषक, शिक्षक, साधारण स्त्री-पुरुष, वनवासी एवं सभी ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और पराधीनता के अंधेरे को समाप्त करने की प्राणपण से कोशिश की। स्वाधीनता के लिये सभी भारतीयजन का उत्सर्ग हमारे लिये हमेशा ही शक्ति और राष्ट्र प्रेम की सतत प्रेरणा प्रदान करता रहेगा।

पुस्तक अंग्रेजी राज में किसान विद्रोह स्वातंत्र्य समर के गौरव को जागृत करने में सफल होगी।

 

 

अंग्रेजी राज में किसान विद्रोह

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76. जंगल सत्य और जंगल सत्याग्रह

लेखक- घनश्याम सक्सेना
संस्‍करण - 2008
मूल्‍य - 200/-


जंगल सत्याग्रह भारतीय स्वाधीनता संग्राम का अपेक्षाकृत एक अल्पज्ञात मगर एक महत्वपूर्ण आंदोलन है। नमक सत्याग्रह के समानांतर यह सत्याग्रह मध्यप्रदेश के काफी बड़े भूभाग में हुआ था और इसके माध्यम से मध्यप्रदेश के स्वतंत्रता सेनानियों ने विशेषकर आदिवासीजन ने स्वाधीनता आंदोलन की तपिश को और अधिक तीव्र किया था। राष्ट्रीय स्तर पर महात्मा गांधी ने स्वदेशी संसाधनों के अंग्रेजों द्वारा दोहन के विरूद्ध नमक सत्याग्रह का प्रवर्तन किया था और उसी समय मध्यप्रदेश में जंगल सत्याग्रह के माध्यम से वन संपदा के दोहन के विरोध में अलख जगाया था। जंगल सत्याग्रह के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर देश भर में वन संपदा की रक्षा के लिये वन अधिकार कानून का प्रवर्तन हुआ है।

पुस्तक जंगल सत्य और जंगल सत्याग्रह के माध्यम से आंदोलन के अनेक अज्ञात तथ्य उजागर हुए हैं। यह पुस्तक स्वातंत्र्य समर के गौरव को जागृत करने में सफल होगी।

 

 

जंगल सत्य और जंगल सत्याग्रह

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77. उन्नीसवीं सदी में भारत में आदिवासी विद्रोह

लेखक- डॉ. सुरेश मिश्र
संस्‍करण - 2008
मूल्‍य - 200/-


आदिवासियों के विद्रोहो की शुरूआत प्लासी के युद्ध (1757) के एक दशक के बाद ही शुरू हो गयी थी और यह संघर्ष बीसवीं सदी की शुरूआत तक चलता रहा। पूरे भारत में अंग्रेजी शासन की रीति-नीति के कारण आदिवासियों ने विद्रोह किया। अपने सीमित साधनों के बावजूद वे लम्बे समय तक संघर्ष कर पाये क्योंकि वनांचल में गुरिल्ला युद्ध प्रणाली का उन्होनें उपयोग किया। सामाजिक रूप से उनमें आपस में एकता थी और अपनी संस्कृति को बाहरी प्रभाव से बचाने की उन्हें चिंता थी। इन बातों ने उनमें एकजुटता पैदा की और वे शोषण और विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ उठ खड़े हुए। संगठन और साधनों की कमी के कारण हालांकि ये विद्रोह कामयाब नहीं हुए लेकिन इनका सुदूरगामी प्रभाव पड़ा और ब्रिटिश शासन को यह सोचने के लिये विवश होना पड़ा कि आदिवासियों के हितों और उनकी पारम्परिक संस्कृति की उपेक्षा करना महंगा पड़ सकता है। इस कृति में आदिवासियों के विद्रोहों को यथासंभव कालक्रम के अनुसार दिया गया है। जो विद्रोह पहले हुए उनका विवरण पहले है और जो बाद में हुए उनका बाद में है।

विदेशी ताकत के खिलाफ हुए भारतीय स्वाधीनता संग्राम में इन आदिवासियों की भूमिका को अहमियत दिया जाना जरूरी है, अन्यथा स्वाधीनता आंदोलन का जनवादी स्वरूप उभरकर नहीं आयेगा, और तब वह अधूरा ही माना जायेगा।

 

 

उन्नीसवीं सदी में भारत में आदिवासी विद्रोह

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78. जनजातीय लोकगीतों में स्वातंत्र्य चेतना

लेखक- डॉ. विजय चौरसिया
संस्‍करण - 2009
मूल्‍य - 300/-


जब तक कोई लोकगीत प्रचलन में नहीं आता, तब तक उसे लोकगीत की मान्यता प्राप्त नहीं होती, दूसरे शब्दों में लोक द्वारा मान्य न किये गये गीत को लोकगीत का दर्ज़ा नहीं मिलता। बघेलखंड, बुंदेलखंड, छत्तीसगढ़, निमाड़, मालवा आदि अंचलों में गाये जाने वाले लोकगीतों में समय के अनुसार गीतों के विषय भी बदलते रहे हैं। राजनैतिक चेतना में इस परिवर्तन का प्रभाव बहुत अधिक रहा है, क्योंकि देश के बदलते राजनैतिक परिदृश्य के साथ-साथ लोकगीतों के राजनैतिक विषय भी बदले है।

कुछ लोकगीत ऐसे भी हैं, जो सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से प्रेरित होकर लिखे और गाये हैं। जिनमें झॉंसी की रानी लक्ष्मीबाई, रानी दुर्गावती तथा उनके समकालीन एवं सहयोगी नायक-नायिकाओं पर केंद्रित गीत हैं।

लोकगीतों के विषय सामाजिक कुरीतियॉं जैसे- नशा, जनसंख्या वृद्धि, नारी उत्पीड़न, दहेज, बाल-विवाह आदि हो रहे हैं। क्योंकि सामाजिक कुरीतियॉं बहुत धीरे-धीरे समाज से दूर होती हैं। अत: ऐसे विषय लम्बे समय तक या फिर आज तक लोकगीतों के सामाजिक चेतना के आधार रहे हैं।

 

 

 

जनजातीय लोकगीतों में स्वातंत्र्य चेतना

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79. 1857 स्वाधीनता संग्राम में जनजातीय बलिदान

लेखक- डॉ. शिवनारायण यादव
संस्‍करण - 2008
मूल्‍य - 150/-


1857 मुक्ति संग्राम अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति का हमारा समवेत संघर्ष तो था ही साथ ही साथ यह संग्राम भारत के समाज, संगीत, शिक्षा, विज्ञान, उद्योग, कृषि, व्यापार आदि सभी क्षेत्रों में जागरण का भी एक महत्वपूर्ण कदम रहा है।

यह हमारे लिये गौरव की बात है कि इस मुक्ति संग्राम में राजा, सिपाही, मजदूर, कृषक, शिक्षक, साधारण स्त्री-पुरुष, वनवासी एवं सभी ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और पराधीनता के अंधेरे को समाप्त करने की प्राणपण से कोशिश की। स्वाधीनता के लिये सभी भारतीयजन का उत्सर्ग हमारे लिये हमेशा ही शक्ति और राष्ट्र प्रेम की सतत प्रेरणा देता रहेगा।

1857 मुक्ति संग्राम के 150 वर्ष अवसर पर हमने स्वाधीनता के महान संग्राम पर शोध, अनुसंधान, आकलन का संकल्प लिया है। 1857: स्वाधीनता संग्राम में जनजातीय बलिदान पुस्तक स्वातंत्र्य समर के गौरव को जागृत करने में सफल होगी।

 

 

1857 स्वाधीनता संग्राम में जनजातीय बलिदान

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80. पुरातत्व में विक्रमादित्य

लेखक- डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित, डॉ. जगन्नाथ दुबे
संस्‍करण - 2012
मूल्‍य - 60/-


संवत् प्रवर्तक राजा विक्रमादित्य भारतीय परम्परा में अद्वितीय शासक रहे हैं। 2069 वर्ष पूर्व उन्होंने जिस संवत् का प्रवर्तन किया था वह कृत, मालव अथवा विक्रम या विक्रमादित्य के नाम से समय-समय पर प्रचलित रहा। आज भी वह विक्रम संवत् के नाम से विख्यात है।

भारतीय परम्परा में महाराजा विक्रमादित्य आदर्श शासक के रूप में सर्वमान्य हैं। उनसे सम्बंधित पुरातात्विक साक्ष्यों की इतिहासविदों को सदा अपेक्षा रही है। संवत् प्रवर्तक युगांतकारी राजा विक्रमादित्य सम्बंधी उनके समकालीन शिलालेख, सिक्के और अनेकाएक विवरण एवं प्रमाण उपलब्ध हैं। विक्रमादित्य पर उपलब्ध पुरासामग्री को 'पुरातत्व में विक्रमादित्य' पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया है। महाराजा विक्रमादित्य के प्रमाणों का यह विवरण जिज्ञासुओं के लिये उपयोगी और प्रेरणा का स्त्रोत बनेगा।

 

 

पुरातत्व में विक्रमादित्य

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81. सिपाही बहादुर - 1857 की पहली जंगे आज़ादी में भोपाल का हिस्सा

लेखक- असदउल्ला खॉं
संस्‍करण - 2008
मूल्‍य - 100/-


भारत के अज़ीम स्वतंत्रता संग्राम 'ग़दर' 1857 का प्रारम्भ 10 मई, 1857 को मेरठ के ख़ूनी हंगामे से हुआ। 11 मई, 1857 को बागी सिपाहियों ने लालकिला दिल्ली और दिल्ली के काफी बड़े भाग पर कब्ज़ा कर लिया। 13 मई तक उन्होंने पूरी दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया था।

भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद करवाने के लिये शुमाली और वसती हिंदुस्तान बड़ी हद तक सशक्त बग़ावत में सम्मिलित हो गया था। इस बड़े तूफान के आगे अंग्रेजों के कदम लगभग उखड़ चुके थे और हर तरफ अंग्रेज बेसहारा बनकर बदहवासी में पागलों की तरह फिर रहे थे। इन परिस्थितियों में भोपाल कंटिनजेंट के बाग़ी सिपाहियों ने वली शाह रिसालदार के नेतृत्व में 6 अगस्त, 1857 को सीहोर (भोपाल) में अंग्रेजों की सत्ता के खिलाफ बग़ावत का झंडा बुलंद किया। उन्होंने बैरसिया और सीहोर में अंग्रेजों के बंगलों को आग लगा दी। बैरसिया में जो अंग्रेज थे उनको कत्ल कर दिया। सरकारी खज़ाने को लूट लिया। जैल और मेगज़ीन इमारतों को तोड़ डाला। इसके फौरन बाद उन्होंने अपनी एक सरकार सिपाही बहादुर के नाम से स्थापित कर दी। उन्होंने जगह-जगह इस नई सरकार के झंडे गाड़ दिये और मुसलमानों, हिंदुओं से अपील की कि वो इस नई सरकार के हाथ मजबूत करें।

 

 

सिपाही बहादुर-1857 की पहली जंगे आज़ादी में भोपाल का हिस्सा

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82. विक्रमादित्य कथाएं

लेखक- डॉ. भगतवतीलाल राजपुरोहित
संस्‍करण - 2012
मूल्‍य - 150/-


महाराजा विक्रमादित्य भारतीय अस्मिता के प्रतीक हैं। विदेशी शकों से उन्होंने भारतभूमि को मुक्ति दिलाकर नया संवत् प्रचलित किया था, जो आज विक्रम संवत् के नाम से प्रसिद्ध है। वे वीर, साहसी, विवेकी, न्यायशील, विद्वान और ऐसे आदर्श शासक थे कि बाद के कितने ही राजा उनके नाम को अपनी उपाधि बनाकर गौरव का अनुभव करते रहे।

ऐसे गौरवशाली विक्रमादित्य सम्बंधी कितनी ही कहानियॉं लिखित तथा वाचिक रूप से देश-विदेश में प्रचलित हैं। उनका प्रचलन ईसा की पहली सदी से ही हो गया था। उस समय की प्राकृत बृहत्कथा के उप्लब्ध संस्कृत रूपांतरों में विद्यमान विक्रमादित्य सम्बंधी सर्वप्राचीन ज्ञात कथाएं हैं। इन प्रचलित कथाओं का हिंदी में अनुवाद कर प्रकाशित किया गया है। विक्रमादित्य कथाएं पुस्तक जिज्ञासुओं के लिये प्रेरणा देने का कार्य करेगी।

 

विक्रमादित्य कथाएं

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83. 1857 स्वतंत्रता संग्राम के रण बांकुरे

चित्रांकन - लक्ष्मण भांड
संस्‍करण - 2008
मूल्‍य - 60/-


1857 मुक्ति संग्राम अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति का हमारा समवेत संघर्ष तो था ही साथ ही साथ यह संग्राम भारत के समाज, संगीत, शिक्षा, विज्ञान, उद्योग, कृषि, व्यापार आदि सभी क्षेत्रों में जागरण का भी एक महत्वपूर्ण कदम रहा है।

यह हमारे लिए गौरव की बात है कि इस मुक्ति संग्राम में राजा, सिपाही, मजदूर, कृषक, शिक्षक, साधारण स्त्री-पुरुष, वनवासी एवं सभी ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और पराधीनता के अंधेरे को समाप्त करने की प्राणपण से कोशिश की। स्वाधीनता के लिये सभी भारतीयजन का उत्सर्ग हमारे लिये हमेशा ही शक्ति और राष्ट्र प्रेम की सतत प्रेरणा प्रदान करता रहेगा।

चित्रकथा 1857:स्वतंत्रता संग्राम के रण बांकुरे पुस्तक स्वातंत्र्य समर के गौरव को जागृत करने में सफल होगी।

 

 

1857 स्वतंत्रता संग्राम के रण बांकुरे

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